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Friday, April 30, 2010

खाद्यान्न भंडारण का वही पुराना राग

खाघ संकट के लिए आमतौर पर कृषि उपज में कमी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। पर देश के किसानों ने इस बार दो फसलों आलू और गेहूं का पर्याप्त उत्पादन किया है। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि किसानों की अथक मेहतन से तैयार फसल के सुरक्षित भंडारण की समुचित व्यवस्था देश में नहीं है। शीतगृहों के अभाव में आलू भंडारण संकट का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि भारतीय खाघ निगम (एफसीआई) के पास गेहूं भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने की बात सामने आ रही है। सही मायने में देश में भंडारगृहों और शीतगृहों की कमी का खामियाजा देश के किसानों को ही भुगतना पड़ता है। देश में बीते साल के 314 लाख टन की तुलना में इस साल 327 लाख टन आलू उत्पादन हुआ है। देश के किसान इस वक्त आलू के दाम अच्छे न मिलने के कारण नवम्बर तक आलू शीतगृहों में रखते हैं। लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में शीतगृहों की संख्या 5400 है, जिनकी क्षमता महज 240 लाख टन भंडारण की है। इनमें सर्वाधिक शीतगृह उत्तर प्रदेश में हैं। इनकी क्षमता भी 97 लाख टन है जबकि राज्य में 125 लाख टन आलू की पैदावार हुई है। इसी प्रकार दूसरे सबसे बड़े आलू उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल में महज 402 शीतगृह हैं। ये गत वर्ष उत्पादित 52 लाख टन आलू के लिए भी पर्याप्त नहीं थे जबकि इस साल आलू उत्पादन करीब 100 लाख टन है। भंडारण के अभाव में आलू उत्पादक कौड़ियों के भाव आलू बेचने को मजबूर हुए। किसानों को देश के कुछ इलाकों में तो आलू का भाव एक रूपए प्रति किलो से भी कम मिला। कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) के अनुसार पश्चिम बंगाल में 2.80 रूपए और उत्तर प्रदेश में 3.10 रूपए प्रति किलो आलू है। यह भाव भी आलू उत्पादन में लगने वाली औसत लागत से कम है। देश में प्रति किलो आलू उत्पादन की लागत 3.50 रूपए आती है। आलू उत्पादकों का संकट अभी टला भी नहीं था कि अब यही कहानी गेहूं उत्पादकों के साथ दोहराई जा रही है। गौरतलब है कि इस बार देश में गेहूं की पैदावार अच्छी होने का अनुमान है। गेहूं एक अप्रैल से ही मंडियों में बिकने के लिए आने लगा है। गेहूं उत्पादक अधिकांश राज्यों में किसानों को मंडियों में गेहूं खरीद के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश में सरकारी खरीद का सही प्रबंध न होने के कारण राज्य के किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे गेहूं बेचने को मजबूर हैं। प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य हरियाणा व पंजाब में भारी मात्रा में गेहूं खरीदने वाली कारगिल, अदानी और आइटीसी जैसी बड़ी कम्पनियों ने इस बार हाथ पीछे खींच लिए हैं। इन राज्यों के मिल मालिक उत्तर प्रदेश से गेहूं खरीद रहे हैं। नतीजन, किसानों को पूरा गेहूं सरकारी एजेंसियों को ही बेचना होगा। दोनों राज्यों का 185 लाख टन गेहूं खरीद का लक्ष्य है। लेकिन इन राज्यों में भंडारण की क्षमता महज 125 लाख टन की है। ऐसे में 60 लाख टन गेहूं कहां रखा जाएगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। मध्यप्रदेश में 45 लाख टन गेहूं खरीद का लक्ष्य रखा गया है जबकि राज्य में भंडारण व्यवस्था महज 23.9 लाख टन की है। राजस्थान की पिछले साल के 10 लाख टन गेहूं खरीद की तुलना में इस सीजन में 7 लाख टन गेहूं खरीदने की योजना है। यहां भी गेहूं भंडारण के लिए सरकार निजी क्षेत्र के गोदामों को किराए पर ले रही है। ऐसे में चालू सीजन में देश भर में 262.67 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य पूरा होने पर यह कहां रखा जाएगा यह चिंता का विषय है। तय है कि सरकारी एजेंसियां खरीद भी लेती हैं तो यह गेहूं आम आदमी तक पहुंचने की बजाए खुले आसमान के नीचे सड़ेगा। देश को अनाज, फल व सब्जियां सुरक्षित रखने के लिए बड़े पैमाने पर भंडारगृहों और शीतगृहों की आवश्यकता है। इस समय एफसीआई की कुल भंडारण क्षमता 284.50 लाख टन मात्र है। हाल में एफसीआई ने आगामी डेढ़ साल में अनाज भंडारण क्षमता 126 लाख टन बढ़ाने की योजना बनाई है। हांलाकि इसके बाद भी भंडारण की व्यवस्था पूरी नहीं हो पाएगी। फिक्की के एक आकलन के मुताबिक शीतगृहों की कमी से देश में 30 ये 35 प्रतिशत यानी 600 लाख टन फल-सब्जियां प्रतिवर्ष बर्बाद हो जाती हैं, जिनकी कीमत करीब 58,000 करोड़ रूपये बैठती है। एक अन्य आकलन के मुताबिक उत्पादन के बाद आम उपभोक्ता के पास पहुंचने तक देश में ढुलाई और भंडारण की उचित व्यवस्था के अभाव में 30 प्रतिशत से अधिक अनाज बर्बाद हो जाता है। दुनिया में सर्वाधिक भूखों वाले देश में इतना अनाज बर्बाद हो जाना गंभीर अपराध नहीं तो और क्या है!

Monday, April 5, 2010

दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी

भारतीय खानपान में दालों का खास महत्व है। दालें प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला भारतीय समाज के कई समुदायों में मांसाहार वर्जित है, जो अतिरिक्त प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। दूसरा खास कारण यह है कि प्रोटीन के अन्य स्रोतों की तुलना में दालें सस्ती मानी जाती रही हैं। पर बीते सालों में जिस कदर दालों की कीमतें बढ़ी हैं ‘दाल-रोटी खाआ॓ प्रभु के गुण गाआ॓’ वाला मुहावरा निरर्थक साबित हो चुका है। इसकी वजह देश की कृषि नीति में तलाशी जा सकती हैं जिसके कारण दाल उत्पादन देश के किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गया है। हरित क्रांति के दौर में गेंहू और धान की उपज दर बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया था। इसमें अच्छी सफलता भी हासिल हुई। इसके अलावा केन्द्र सरकार की खरीद-नीति तथा अन्य समर्थक रणनीति ने भी दोनों प्रमुख खाघान्नों का उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन दाल के मामले में सरकार ने जरूरत से ज्यादा लापरवाही एवं उदासीनता दिखाई। प्रौघोगिकी व कृषि पद्धति की दृष्टि से भी इसके उत्पादन में कोई उल्लेखनीय सुधार नजर नहीं आया। न कोई सामयिक योजना बनाई गई और न ही उत्पादकों को कोई अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया गया। इसके अलावा जोखिम एवं लागत खर्च, सरकारी खरीद नीति की गैर मौजूदगी, उन्नत एवं उच्च उपज दर वाली प्रजाति के बीजों की कमी, कृषि क्षेत्र का दयनीय बुनियादी ढांचा दाल उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। बीजों की बात करें तो देश में धान और गेहूं के 90 प्रतिशत प्रमाणित बीज किसानों को मिल जाते हैं। 40 सालों में राष्ट्रीय बीज कॉरपोरेशन ने दालों के 400 बीज विकसित किए हैं पर इनमें से 124 का ही उपयोग उत्पादन के लिए किया जा रहा है। इनमें से भी 10-12 किस्में ही किसानो को आसानी से मिल पाती हैं। जहां दाल उत्पादन के प्रति सरकार उदासीन रही है वहीं निजी कंपनियां भी इनके अनुसंधान पर पैसा खर्च नहीं करती हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि दाल खासकर दक्षिण एशिया की फसल है और निजी बीज कंपनियों को इसमें लाभ नजर नहीं आता। भारत में दाल की औसत उत्पादकता दर 600 किलो प्रति हेक्टेयर है जो संसार के सर्वक्षेष्ठ उपज दर वाले देशों से बहुत पीछे है। कुछ देशों में औसत उपज दर 1800 किलो प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की जा रही है। अन्य फसलों और दलहन फसलों में किसानों के लाभ के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है। दाल की उपज दर प्रति हेक्टेयर 600 किलो है जबकि धान की 3000 किलो प्रति हेक्टेयर से अधिक। सरकार द्वारा अरहर के लिए 2009-10 में घोषित किया गया न्यूनतम सर्मथन मूल्य (एमएसपी) 2300 रूपए प्रति क्विंटल है। इसी दौरान धान का समर्थन मूल्य 1080 रूपए प्रति क्विंटल। यानी एक हेक्टेयर में दाल उत्पादन करने में किसान को एक लाख 38 हजार रूपए प्राप्त होता है जबकि इतनी ही भूमि पर धान बोने पर 3 लाख 32 हजार प्राप्त होते हैं। यानी दोगुने से ज्यादा। इसके अलावा दलहन की फसल तैयार होने में समय भी ज्यादा लगता है। करीब 8-10 माह में इसकी फसल तैयार होती है जबकि किसान साल में धान और गेहूं की दो फसल ले लेते हैं। दाल की फसल ठंड और गर्मी के प्रति भी ज्यादा संवेदनशीन होती है। भारत में कीड़ों-रोगों के साथ-साथ फसल पोषण का प्रबंधन भी कमजोर और अपर्याप्त है। परिणामस्वरूप उपज दर घट जाती है। रोगों के लगने की संभावना भी दाल की फसल में ज्यादा होती है। जैसे प्रोटीन के कारण इंसान दालों को पंसद करते हैं, कीट भी दालों को पसंद करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 250 कीट दालों को खराब कर देते हैं। परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष 20 लाख टन से अधिक दालें बरबाद हो जाती हैं। इधर सुखद संकेत यह है कि आजादी के साठ साल बाद देश के बजट में दलहन उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने देश में 60 हजार दलहन-तिलहन गांव बनाने के लिए 300 करोड़ का अतिरिक्त बजट आवंटित किया है। हालांकि, जिस कदर किसान दाल उत्पादन से मुंह मोड़ चुके हैं, यह बजट नाकाफी है। दलहन-तिलहन गांव के लिए आंवटित बजट देश के दाल आयात बिल का महज 2.5 प्रतिशत है। दाल उत्पादन के लिए खर्च किए जाने वाली कुल राशि भी आयात बिल का महज 6 प्रतिशत है। दालों के आयात पर देश सलाना 12 हजार करोड़ रूपए व्यय करता है जबकि योजनाओं का कुल सलाना बजट महज 700 करोड़ है। यदि देश को दालों के मामले में आत्मनिर्भर होना है तो दाल आयात का एक हिस्सा दाल उत्पादन में व्यय करना पडे़गा ताकि आने वाले समय में दालों का आयात बजट कम हो और आम आदमी को उचित दाम पर सुगमता से दाल प्राप्त हो।

Wednesday, December 30, 2009

युद्धजनित तनाव में अमेरिकी सैनिक...................आत्महत्या का आंकड़ा २०० के पार

हाल के दो घटनाक्रमों से पता चलता है कि विदेशी जमीन पर युद्ध लड़ते हुए अमेरिकी सैनिक किस कदर दबाव में हैं। पहला, 30 हजार अतिरिक्त सैनिक अफगानिस्तान भेजने के निर्णय को साार्वजनिक करते समय अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह भी बताना पड़ा कि 18 माह उपरांत सैनिकों की घर वापसी शुरू हो जाएगी। दूसरा, कुछ समय पहले ही एक अमेरिकी मेजर ने अपने 13 साथियों को अपनी ही गोलियों से मार डाला था। बताया जाता है कि उसकी तैनाती अफगानिस्तान में होने वाली थी। तैनाती की जानकारी मिलने के बाद से ही मेजर अवसाद में था। दरअसल अमेरिका द्वारा इराक व अफगानिस्तान में चलाए जा रहे अंतहीन युद्ध का दबाव अमेरिकी सैनिकों पर युद्ध के मैदान और घरेलू मोर्चे पर दोनों जगह देखा जा रहा है।

एक ओर इराक व अफगानिस्तान में तैनात सैनिकों में नशा करने की प्रवृत्ति बढ़ने के समाचार पहले से ही सामने आते रहे हैं दूसरी ओर अमेरिकी सेना में आत्महत्या के मामले साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। अमेरिकी सेना द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि गत कुछ सालों में सैनिकों में आत्महत्या करने के प्रयासों और उससे मरने वाले सैनिकों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है। इस वर्ष यह आंकडा 200 के पार पहंुच गया है। 31 अक्टूबर तक 211 सैनिकों ने आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया जबकि 2008 में इस तरह 197 सैनिकों ने अपनी जान दे दी थी। उल्लेखनीय है कि तकरीबन 11 लाख सैनिकों वाली अमेरिकी सेना ने 1980 से आत्महत्या के आंकड़े की जानकारी रखना प्रारम्भ किया था। 2009 का आंकड़ा अभी तक का सर्वाधिक है। 2003 में 79, 2004 में 67, 2005 में 85, 2006 में 102 और 2007 में 115 सैनिकों ने आत्महत्या की थी।


हांलाकि, सेना अफगानिस्तान व इराक में तैनाती और आत्महत्या के बीच किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार करती आई है, लेकिन जानकार मानते हैं कि आत्महत्या की प्रमुख वजह युद्ध जनित तनाव ही है। गौर करने वाली बात यह है कि सेना के ही मुताबिक 41.8 प्रतिशत सैनिक पहली तैनाती के बाद ही ऐसा कदम उठा लेते हैं जबकि 10.3 प्रतिशत सैनिक दो बार तैनाती के बाद 1.7 प्रतिशत सैनिक तीन बार तैनाती के बाद और करीब एक प्रतिशत चार बार तैनाती के बाद अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। सेना में आत्महत्या का अनुपात प्रति लाख सैनिकों पर 20 पहुंच गया है जो देश के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। कुल आबादी में यह अनुपात प्रति लाख पर 19 का है। इन आठ सालों में आत्महत्या से मरने वालों की संख्या अफगानिस्तान में युद्ध में अब तक कुल मारे गए सैनिकों से ज्यादा है। प्रतिदिन औसतन 5 सैनिक आत्महत्या का प्रयास करते हैं।

आत्महत्या के निरंतर बढ़ते मामलों से चिंतित अमेरिकी सेना एक और सेना में मनोचिकित्सों की संख्या बढ़ा रही है दूसरी और ‘नेशनल इनसटिट्यूट आॅफ मेंटल हैल्थ’ के साथ मिलकर आत्महत्या की वजहों को जानने के लिए एक विस्तृत अध्ययन भी कर रही है। यहां यह बताते चलें कि इराक और अफगानिस्तान में अपनी सेवा देने के बाद सेवानिवृत हुए सैनिकों में भी आत्महत्या के मामले सामने आ रहे हैं। हांलाकि, भूतपूर्व सैनिकों के आत्महत्या के अधिकारिक रिकार्ड अमेरिका में नहीं रखे जाते है, लेकिन स्वतंत्र अध्ययन बताते हैं कि इनकी संख्या सेवारत सैनिकों से भी ज्यादा हो सकती है।


न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों और स्थानीय सेना में नशा करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। 2003 के बाद इराक के मेडिकल स्टोरों में ‘अर्टेन’ नामक दवा की बिक्री एकाएक बढ़ गई है। यहां तक की इस दवा की काला बाजारी भी जोरों पर है। यह दवा सैनिकों को दबाव में राहत देती है। माना जाता है कि दवा सैनिकों को साहसी और बहादुर बनाती है। खासकर सैनिक इस दवा को उपयोग तब करते है जब किसी के घर में छापा मारना होता है क्योंकि इस दवा को लेने के बाद सैनिक बेझिझक किसी का भी दरवाजा तोड़ कर अंदर घूस जाते हैं। कुछ सर्वे में पाया गया है कि तीन में से एक सैनिक इस दवा का सेवन कर रहा है।


इसके अलावा अन्य भी वजहें हैं जो सेना के लिए चिंता का विषय हैं जैसे सैनिकों के परिजनों का युद्ध का विरोध और कई सैनिकों का सेना को छोड़ देना इत्यादि। अमेरिकी सेना ने अतीत में विदेशी जमीन पर युद्ध लड़ते हुए इससे भी बुरे दिन देखे हैं। वियतनाम युद्ध के दौरान कई सैनिकों युद्ध के मैदान से भाग गये थे। अमेरिका के सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि 1968 में ही 53000 हजार सैनिक भागे थे। 70 के दशक में ऐसी घटनाएं हुई थी जब सिपाहियों की पूरी की पूरी टुकड़ी ने आदेश मानने से इंकार कर दिया था। अतीत के यह अनुभव अमेरिका की चिंता केा ओर बढ़ा देते हैं यही वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को देशवासियों को बारबार यह बताते रहना पड़ता है कि सेना की वतन वापसी जल्द ही होगी ।

Tuesday, December 22, 2009

आयातित अनाज पर बढ़ती निर्भरता


भारत को कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है, जिसकी 65-70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इस आबादी के खेती में लगे होने के बावजूद देश को अपनी खाघ जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। हाल के वर्षों में खाघ पदार्थो के आयात की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। उदारीकरण से पूर्व भारत की आयात प्राथमिकताएं तीन भागों में बंटी थीं। पहला, विकास हेतु अत्याधुनिक मशीनरी का आयात; दूसरा, भारत में अनुपलब्ध पेट्रोलियम पदार्थो का आयात और तीसरे स्थान पर वे अन्य वस्तुएं व खाघ पदार्थ थे, जिनकी देश में अत्यंत कमी थी। लेकिन ’90 के बाद से भारत ने घरेलू बाजार में प्रतियोगिता के नाम पर आयात शुल्क में निरंतर कटौती करना शुरू किया। उसके बाद से ही देश में खाघ पदार्थों की पर्याप्त आपूर्ति करने, कीमतों में नियंत्रण के लिए आयात का शॉर्टकट फार्मूला अपनाया। नीति निर्माताओं ने दावा किया था कि आयात पर उदार नीति, आपूर्ति की कमी पाटने और इस तरह मूल्य नियंत्रण में कारगर साबित होगी। हालांकि ये दावे हवाई साबित हुए हैं, लेकिन अब यह नीति ही बन गई है कि जिस भी खाघ वस्तु की कमी होती है, सरकार तुरंत आयात का निर्णय ले लेती है। पिछले एक साल में जिस तेजी से महंगाई बढ़ी है, उसी गति से आयात भी बड़ा है। वाणिज्य एवं उघोग मंत्रालय द्वारा संवेदनशील वस्तुओं के आयात के बारे में जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच माह में देश में संवेदनशील वस्तुओं का आयात पिछले साल की इसी अवधि में हुए आयात के मुकाबले 30 प्रतिशत बढ़कर 22,429 करोड़ रूपए पहुंच गया है। इस दौरान देश में सकल उपभोक्ता वस्तुओं का कुल आयात 4 लाख 97 हजार 108 करोड़ रूपए का हुआ। गौरतलब है कि अनाज, दाल, फल व सब्जियों, चाय, कॉफी, दूध एवं दुग्ध उत्पादों व खाघ तेल का आयात सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ा है। तिलहन उघोग के प्रमुख संगठन सैलवेंट एक्स्ट्रेक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के आंकड़ों के मुताबिक, नवम्बर, 2008 से अक्टूबर, 2009 के दौरान पिछले साल की तुलना में वनस्पति तेल का आयात 37 प्रतिशत बढ़ा है। इस दौरान 28 हजार करोड़़ रूपये मूल्य का रिकॉर्ड 86.6 लाख टन वनस्पति तेलों का आयात किया गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में 25 हजार करोड़ रूपए मूल्य के 63.1 लाख टन तेलों का आयात हुआ था। यहीं यह बताते चलें कि 1994 में वनस्पति तेलों का आयात शुरू होने से अब तक यह रिकॉर्ड आयात है। हाल में आसमान छूती चीनी की कीमतें सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही हैं। चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक होने, लगातार दो वर्ष तक अपनी खपत से 40 लाख टन अधिक चीनी उत्पादन करने के बावजूद अब देश भारी मात्रा में चीनी आयात कर रहा है। अक्टूबर, 2009 तक भारत 50 लाख टन रॉ शुगर व 8 लाख टन सफेद चीनी आयात कर चुका है। चालू मार्केटिंग सीजन में भी कम से कम 60 लाख टन चीनी आयात होने की संभावना है। यहां यह बताना जरूरी है कि देश 30 रूपए प्रति किलो से ऊपर के भाव पर चीनी आयात कर रहा है, जबकि साल भर पहले ही भारत ने 12 रूपए प्रति किलो की दर से 48 लाख टन चीनी निर्यात की गई थी। दालों की कीमत नियंत्रित करने के लिए भी सरकार ने आयात का ही मार्ग चुना है। विडम्बना यह है कि म्यांमार जैसा छोटा व पिछड़ा देश भारत को दालों का निर्यात कर रहा है। देश में दालों की सालाना खपत 180 लाख टन है, जबकि सालाना उत्पादन लगभग 150 लाख टन है। देश में जनसंख्या के बढ़ने के साथ ही प्रतिवर्ष 5 लाख टन दाल की खपत बढ़ रही है, जबकि इसके अनुरूप उत्पादन बढ़ाने की योजना पर गौर नहीं हो रहा है। दालों के आयात से दालों की विक्रय कीमत पर तो दबाव नहीं बन रहा है, जबकि दाल उत्पादकों को आयात की वजह से अच्छी कीमत नहीं मिल पा रही है। अब 21 साल बाद देश चावल भी आयात करने जा रहा है। चावल आयात भी 20 लाख टन होने का अनुमान लगाया जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियां 30 हजार टन चावल आयात के लिए टेंडर भी जारी कर चुकी हैं। इस पर निर्यातकों की आ॓र से जो निविदाएं भरी गई हैं, उनमें दर्ज मूल्य घरेलू भाव से लगभग दोगुना है। अन्य कृषि जिंसों की तरह चावल आयात पर भी शुल्क हटा दिया गया है। इससे व्यापारी घरेलू बाजार के बजाय चावल आयात में लाभ देख रहा है जिसका दबाव अंतत: देश के धान उत्पादक किसानों पर पडे़गा। कुल मिलाकर, देश की खाघ पदार्थों के आयात पर बढ़ती निर्भरता दूरगामी रूप से देश हित के खिलाफ है, जो भविष्य में भयंकर खाघ असुरक्षा में डाल सकता है। इसलिए गंभीर चिंतन की जरूरत है कि कैसे देश में कृषि उपज को बढ़ाया जाए, क्योंकि भारत जैसा विशाल जनसंख्या वाला देश आयात से अपने नागरिकों के लिए भरपेट भोजन का प्रबंध नहीं कर सकता।
७ दिसम्बर को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख ।