Tuesday, December 22, 2009

आयातित अनाज पर बढ़ती निर्भरता


भारत को कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है, जिसकी 65-70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इस आबादी के खेती में लगे होने के बावजूद देश को अपनी खाघ जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। हाल के वर्षों में खाघ पदार्थो के आयात की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। उदारीकरण से पूर्व भारत की आयात प्राथमिकताएं तीन भागों में बंटी थीं। पहला, विकास हेतु अत्याधुनिक मशीनरी का आयात; दूसरा, भारत में अनुपलब्ध पेट्रोलियम पदार्थो का आयात और तीसरे स्थान पर वे अन्य वस्तुएं व खाघ पदार्थ थे, जिनकी देश में अत्यंत कमी थी। लेकिन ’90 के बाद से भारत ने घरेलू बाजार में प्रतियोगिता के नाम पर आयात शुल्क में निरंतर कटौती करना शुरू किया। उसके बाद से ही देश में खाघ पदार्थों की पर्याप्त आपूर्ति करने, कीमतों में नियंत्रण के लिए आयात का शॉर्टकट फार्मूला अपनाया। नीति निर्माताओं ने दावा किया था कि आयात पर उदार नीति, आपूर्ति की कमी पाटने और इस तरह मूल्य नियंत्रण में कारगर साबित होगी। हालांकि ये दावे हवाई साबित हुए हैं, लेकिन अब यह नीति ही बन गई है कि जिस भी खाघ वस्तु की कमी होती है, सरकार तुरंत आयात का निर्णय ले लेती है। पिछले एक साल में जिस तेजी से महंगाई बढ़ी है, उसी गति से आयात भी बड़ा है। वाणिज्य एवं उघोग मंत्रालय द्वारा संवेदनशील वस्तुओं के आयात के बारे में जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच माह में देश में संवेदनशील वस्तुओं का आयात पिछले साल की इसी अवधि में हुए आयात के मुकाबले 30 प्रतिशत बढ़कर 22,429 करोड़ रूपए पहुंच गया है। इस दौरान देश में सकल उपभोक्ता वस्तुओं का कुल आयात 4 लाख 97 हजार 108 करोड़ रूपए का हुआ। गौरतलब है कि अनाज, दाल, फल व सब्जियों, चाय, कॉफी, दूध एवं दुग्ध उत्पादों व खाघ तेल का आयात सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ा है। तिलहन उघोग के प्रमुख संगठन सैलवेंट एक्स्ट्रेक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के आंकड़ों के मुताबिक, नवम्बर, 2008 से अक्टूबर, 2009 के दौरान पिछले साल की तुलना में वनस्पति तेल का आयात 37 प्रतिशत बढ़ा है। इस दौरान 28 हजार करोड़़ रूपये मूल्य का रिकॉर्ड 86.6 लाख टन वनस्पति तेलों का आयात किया गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में 25 हजार करोड़ रूपए मूल्य के 63.1 लाख टन तेलों का आयात हुआ था। यहीं यह बताते चलें कि 1994 में वनस्पति तेलों का आयात शुरू होने से अब तक यह रिकॉर्ड आयात है। हाल में आसमान छूती चीनी की कीमतें सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही हैं। चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक होने, लगातार दो वर्ष तक अपनी खपत से 40 लाख टन अधिक चीनी उत्पादन करने के बावजूद अब देश भारी मात्रा में चीनी आयात कर रहा है। अक्टूबर, 2009 तक भारत 50 लाख टन रॉ शुगर व 8 लाख टन सफेद चीनी आयात कर चुका है। चालू मार्केटिंग सीजन में भी कम से कम 60 लाख टन चीनी आयात होने की संभावना है। यहां यह बताना जरूरी है कि देश 30 रूपए प्रति किलो से ऊपर के भाव पर चीनी आयात कर रहा है, जबकि साल भर पहले ही भारत ने 12 रूपए प्रति किलो की दर से 48 लाख टन चीनी निर्यात की गई थी। दालों की कीमत नियंत्रित करने के लिए भी सरकार ने आयात का ही मार्ग चुना है। विडम्बना यह है कि म्यांमार जैसा छोटा व पिछड़ा देश भारत को दालों का निर्यात कर रहा है। देश में दालों की सालाना खपत 180 लाख टन है, जबकि सालाना उत्पादन लगभग 150 लाख टन है। देश में जनसंख्या के बढ़ने के साथ ही प्रतिवर्ष 5 लाख टन दाल की खपत बढ़ रही है, जबकि इसके अनुरूप उत्पादन बढ़ाने की योजना पर गौर नहीं हो रहा है। दालों के आयात से दालों की विक्रय कीमत पर तो दबाव नहीं बन रहा है, जबकि दाल उत्पादकों को आयात की वजह से अच्छी कीमत नहीं मिल पा रही है। अब 21 साल बाद देश चावल भी आयात करने जा रहा है। चावल आयात भी 20 लाख टन होने का अनुमान लगाया जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियां 30 हजार टन चावल आयात के लिए टेंडर भी जारी कर चुकी हैं। इस पर निर्यातकों की आ॓र से जो निविदाएं भरी गई हैं, उनमें दर्ज मूल्य घरेलू भाव से लगभग दोगुना है। अन्य कृषि जिंसों की तरह चावल आयात पर भी शुल्क हटा दिया गया है। इससे व्यापारी घरेलू बाजार के बजाय चावल आयात में लाभ देख रहा है जिसका दबाव अंतत: देश के धान उत्पादक किसानों पर पडे़गा। कुल मिलाकर, देश की खाघ पदार्थों के आयात पर बढ़ती निर्भरता दूरगामी रूप से देश हित के खिलाफ है, जो भविष्य में भयंकर खाघ असुरक्षा में डाल सकता है। इसलिए गंभीर चिंतन की जरूरत है कि कैसे देश में कृषि उपज को बढ़ाया जाए, क्योंकि भारत जैसा विशाल जनसंख्या वाला देश आयात से अपने नागरिकों के लिए भरपेट भोजन का प्रबंध नहीं कर सकता।
७ दिसम्बर को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख ।

1 comment:

Mukesh Singh said...

EXCELENT ARTICLE - MUKESH