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Monday, March 22, 2010

भगत सिंह के शहादत दिवस के प्रति सरकार उदासीन क्यों ?



देश में किसी महापुरुष की सबसे ज्यादा उपेक्षा हुई है तो वह निर्विवाद रूप से शहीदे आजम भगत सिंह हैं। उन्हें याद किया भी जाता है तो सिफर् इसलिए की एक नौजवान २३ साल की उम्र में हंसते हुए देश की खातिर सुली पर चढ़ गया। वह क्या सोचते थे, सामाजिक, आथिर्क समस्याओं के प्रति उनका क्या नजरिया था यह बिरले ही लोग जानते हैं। स्कूल, कालेजों, सरकारी, गैरसरकारी कायरलयों में सार्वजनिक अवकाश देश में महापुरुषओं को याद करने का एक प्रचलित तरीका है। यह रस्म अदायगी भी भगत सिंह के लिए नहीं की जाती। भगतसिंह का न जन्म दिन मनाया जाता है न ही पुण्यतिथि। परिणाम यह है कि भगतसिंह को पसंद करने वाला जन मानस न उनका जन्मदिन बता सकता है न ही उसे उसका ?शहादत दिवस ही याद है। आज यानी २३ माचर् को उसी भगत सिंह का शहादत दिवस॔ है। आज ही के दिन १९३१ की आधी रात को भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इन नौजवानों का गुनाह सिफर् इतना था कि वे हर कीमत पर मुल्क की आजादी चाहते थे। आखिरकार उनकी शहादत अगस्त १९४७ में रंग लाई जब देश बि्रटिश साम्राज्य की गुलामी से मुक्त हुआ। पर आजादी के ६ साल बाद भी देश कई आथिर्क व सामाजिक समस्याओं का सामना कर रहा है। इनमें जातिवाद और साम्प्रदायिकता देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बने हुए है। भगत सिंह के विचारों में इन सामाजिक बुराईयों का सटीक हल नजर आता है। छोटी सी उम्र में उन्होंने कई विचारोत्तोजक लेख लिखे। उनके लेख ताकिर्कता और वैज्ञानिकता से परिपूर्ण हैं। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि उनके लिखे सभी लेख आज तक किसी भी सरकार द्वारा प्रका?िशत नहीं किए गऎ हैं। सरकारें इसके प्रति पूर्णतः उदासीन रही है। आजादी के बाद के कई नेताओं पर लिखी विरुदावलियां या उनकी लिखीं पुस्तकें सरकारी प्रकाशनों द्वारा प्रका?िशत की गई हैं। पुस्तकालयों में बहुतायत मिल भी जाती हैं पर भगत सिंह पर किताबें मुिश्कल से ही मिलती हैं। भगत सिंह का सबसे चचिर्त लेख है मैं नास्तिक क्यों हूं॔। जिसे उन्होंने अक्टूबर १९३ में जेल में लिखा था। यहां यह बता देना प्रसांगिक होगा कि १८ साल की उम्र में ही उन्होंने ईश्वर और धर्म को तिलांजलि दे दी थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हें यकीन हो चला था कि सृ?ि्षट का निमार्ण या उस पर नियंत्र्ण करने वाली कोई सर्व?शक्तिमान परम सत्ताा नहीं है। इस लेख में भगत सिंह ने उन सवालों का जवाब भी दिया जो उनपर उस वक्त उठना लाजमी थे। उनका ई?श्वर पर यकीन न करने की वजह यह नहीं था कि ई?श्वर ने उनकी कोेई मनोकामना पूरी न की हो। उसके पीछे उन्होंने ठोस वैज्ञानिक कारण गिनाए और यह भी साफ लिखा कि वे किसी अहम` के कारण सर्व?शक्तिमान और सर्वव्यापी माने जाने वाले ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं कर रहे हैं। जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता और विश्व बधुंत्व पर लिखे उनके लेख आज की ?ारेलू व अंतरार््षट्रीय परिस्थिति में और भी प्रासंगिक हो गए हैं। १९२८ में भगत सिंह के लिखे तीन लेख ॑धर्म और हमारा स्वतंत्र संग्राम॔ ॑साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज॑ और ॑अछूत का सवाल॔ जो मई और जून में ॑किरती॔ में छपे थे। आज की भारतीय परिस्थिति पर सटीक बैठतें हैं। जिस अस्पृ?श्यता का उन्मूलन हम २१ वीं सदी में भी नहीं कर पाएं हैं भगत सिंह उस बारे लिखते हैं ॑॑उनके अछूतों मंदिरों में प्रवे?श से देवगण नाराज हो उठेंगे! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआं अपवित्र् हो जाएगा! ये सवाल बीसवीं ?शताब्दी में किए जा रहे हैंं, जिन्हें कि सुनते ही ?शर्म आती है। स्वतंत्र्ता संग्राम में भागीदारी करने वालों से भगत सिंह का सीधा सवाल था कि यदि आप एक इंसान को पीने का पानी देने से इंकार करते हो तो आप राजनीतिक अधिकार मांगने के अधिकारी कैसे बन गए?? भगत सिंह के साम्प्रदायिकता पर लिखें लेख से साफ प्रकट होता है कि वे भारतीय राजनीति व समाज में अब तक प्रचलित ॑सर्वधर्म समभाव॔ की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा से इत्ताफाक नहीं रखते थे। उनका मानना था कि अपने अपने धर्म का अनुपालन करते हुए दो धर्म के लोगों का एक साथ रह पाना मुमकिन नहीं है। क्योंकि एक धर्म के अनुसार गाय का बलिदान जरूरी है तो दूसरे में गाय की पूजा का प्रावधान है। भगत सिंह इसी प्रकार अन्य उदाहरण गिनाते हैं। आजादी के आंदोलन में भी धर्म के प्रयोग को भगत सिंह आंदोलन के लिए बड़ी बाधा के रूप में देखते थे। उन्होंने साफ लिखा है कि इन धमोर् ने हिंदुस्तान का बेड़ा गकर् कर दिया है। भवि?्षय की उनकी दृ?ि्षट क्या थी जानते है उन्हीं के ?शब्दों में॑॑हमारी आजादी का अथर् केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्र्ता का नाम है " जब लोग परस्पर ? घुल मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जाऎंगे। हम आज भी दिमागी गुलामी से मुक्त होने का इंतजार कर रहे हैं।

Saturday, December 19, 2009

भगवान् कहिये या खुदा फर्क तो पड़ता है

आज ऑनलाइन होते ही एक मित्र से चेट होने लगा। मैंने मजाकिया मूड में लिखा
फरमाइए
रिप्लाई आया: खेरियत है। आप ?
मैंने कहा : दुआ है आपकी
हमारी क्या दया होती है दया तो ऊपर वाले की है ।
ऊपर वाला कौन ?
भगवान्
भगवान् या खुदा
एक ही बात है ।
फिर क्या था मैंने भी कहा कैसे मंदिर की जगह कभी मस्जिद या चर्च चले जाते हो क्या ?
जवाब आया : नहीं
मैंने भी कहा : तो खुदा, भगवान् एक ही कैसे हो गए?
मित्र झल्ला गए बोले सुबह - सुबह चाटने को कोई नहीं मिला क्या ?
मैंने कहा आप सवाल के जवाब से बच रहे हैं। बात एक ही है तो कभी चर्च चले जाया करो कभी गुरुद्वारा कभी .... ।


ऐसा क्यों होता है की हम बोलने को तो बोल देते हैं एक ही बात है व्यवहार में ऐसा नही होता । क्या आप भी कहते हैं एक ही बात है । लेकिन कुछ भी कह दीजिये भगवान् कहिये या खुदा फर्क तो पड़ता है ।
बकबक समाप्त ।

Thursday, September 11, 2008

छोटी-छोटी बड़ी बातें

जनरल और कवि

एक जनरल और एक कवि के बीच क्या अंतर होता है ?

जनरल
युद्धस्थल पर दुश्मनों के मृतकों की संख्या गिनता है,

जबकि कवि इस बात का हिसाब लगाता है कि युद्ध में कितने जीवित लोग मारे गए।

मरे हुए लोगों के बीच कोई बैर नही रहता ।

उनका एक ही दुश्मन होता है : म्रत्यु । रूपक स्पष्ट है।

दोनों और के दुश्मन अब दुश्मन नही रहे हैं।


महमूद दरवेश