1५ अगस्त को एक बार फिर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से झंडा फहरा देंगे। इस दिन का यही अर्थ रहगया है । ६१ वर्ष उपरांत भी यह दिवस लोगों के बीच अपनी जगह नही बना पाया है। स्कूल के बच्चे इस दिन स्वीट्स मिलने व् पदाई न होने से खुश रहते हैं और नोकरी पेशा लोगों को एक छुट्टी मिल जाती है । वैसे १५अगस्त और २६ जनवरी हमारे राष्ट्रीय पर्व हैं । क्या ये वास्तव में राष्ट्रीय हैं ? इसके विपरीत दीपावली , ईद , क्रिसमस डे , वैशाखी आदी त्योहारों का असर ऐसा होता है की लगभग पूरा देश अपने आप ही खुशियों में दूब जाता है । इसका अर्थ यह नही की हम आज भी भारतीय नही बन पायें हैं ! हम या तो हिन्दू है या मुसलमान या फिर सिक्ख । मन्दिर बनने के लिया पुरा देश अयोध्या कूच कर जाता है , लेकिन कर्र्गिल जैसी लडाई के समयसब घर में बैठकर सेना की करवाई का इन्तजार करते हैं ।
देश में कोई भी परिवार ऐसा नही होगा जहाँ १५ अगस्त की कोई तैयारी चल रही होगी । हाँ १५ अगस्त सेवीकएंड में एक दिन जरुर बड गया। आख़िर कब तक १५ अगस्त सरकारी पर्व बना रहेगा ? क्या यह कभीआपका और मेरा दिवस बन पायेगा ......................... ?
Wednesday, August 13, 2008
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3 comments:
बहुत अच्छा लिखा है। स्वागत है आपका।
भारतमाता का आँचल हिमालय के श्वेत हिम शिखरों से लेकर केरल की हरियाली तक फैला हुआ है। कन्याकुमारी के महासागर की तरंगो मे इसकी तिरंगी आभा लहराती है। माता अपने आँचल मे अपनी सभी सौ करोड़ संतानों को समेटे हुऐ है | सभी जातिया, सभी वर्ण, सभी वंश इसी की कोख से उपजे है। माता अपनी छाती चीरकर सभी के लिए पोषण की व्यवस्था जुटाती है। संतानों का सुख ही इस माँ का सुख है, संतानों का दुःख ही इसकी पीड़ा है।
सटीक व् जायज सवाल? हमें इस पर चर्चा करनी चाहिए! आख़िर सब क्यों?
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